चुनावी हलचल के बीच नीतीश कुमार के ‘निश्चित’ होने से जदयू कैसे अपना अस्तित्व खो रहा?

बिहार में चल रही तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार निश्चित नजर आ रहे हैं। वे न सीट शेयरिंग पर कुछ बोलते दिख रहे हैं, न टिकटों के बंटवारे पर। भाजपा और जदयू बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। इससे पहले तक जदयू, भाजपा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती रही थी। इस तरह एनडीए में जदयू का कद ‘बड़े भाई’ का था, लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि बिहार का सीन बदल गया है। भाजपा छोटे भाई से अब बराबरी की भूमिका में जदयू के सामने खड़ी है। सीट बंटवारे के ऐलान के बाद से ही सभी के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर एक-एक सीट पर अड़ने वाले नीतीश कुमार भाजपा से बराबरी पर कैसे मान गए?

“जदयू हमारे नेता नीतीश कुमार के हाथ से निकल चुकी है। यह पार्टी अब तीन लोगों को हाथ में गिरवी है और वही नीतीश कुमार को अंधेरे में रखकर सारे फैसले ले रहे हैं। जदयू कभी लव-कुश,अति पिछड़ा और दलितों की पार्टी मानी जाती थी, मगर अब जो लोग सारे फैसले ले रहे हैं, उनमें इन जातियों का कोई नहीं है। हमार प्रदेश अध्यक्ष जरूर हैं, मगर उनकी हैसियत किसी दरबान जैसी रह गई है.” 10 अक्टूबर को जब पूर्णिया के पूर्व सांसद संतोष कुमार कुशवाहा जदयू छोड़कर राजद का दामन थाम रहे थे तो उन्होंने मीडिया के सामने ये बातें रखीं।

वहीं पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव सोशल मीडिया पर लिख चुके हैं कि, “संजय झा ने आज अपना मिशन पूरा कर लिया, नीतीश कुमार जी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने हेतु मजबूर करने का षड्यंत्र पूरा।”

टिकट बंटवारे और सीटों के आवंटन को लेकर नाराजगी जाहिर कर रहे जदयू के कुछ कार्यकर्ता खुलकर ये कहते हैं कि नीतीश कुमार की सेहत प्रभावित हुई है। नहीं तो ऐसी स्थिति नहीं रहती। राज्य के कई पत्रकारों के मुताबिक जदयू पार्टी के मुख्य फैसले राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, केंद्रीय मंत्री,लल्लन सिंह, बिहार सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी,विधान परिषद सदस्य ललन सर्राफ़ ले रहे है। 

पीआर एजेंसी में क्रिएटिव टीम में मैनेजर के पद पर काम कर रहें आशीष कुमार बताते हैं, “इस सब की शुरुआत 2024 के लोकसभा चुनाव में ही हो गई थी। पहली बार सीटों के बंटवारे में भाजपा,जदयू के मुकाबले एक ज्यादा सीट पर चुनाव लड़ा था। जबकि इससे पहले के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों के बीच 10 सीटों का अंतर होता था।”

“जदयू 25 और भाजपा 15 सीटों पर लड़ती थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों बराबर हुई और 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपाआगे निकल गई। विधानसभा चुनाव में हुई सीट शेयरिंग लोकसभा के नतीजों के आधार पर हुई है। 2024 लोकसभा में जदयू और भाजपा की सीटें बराबर आई थी, इसलिए दोनों को बराबर सीटें मिलीं। 5 सीटें जीतने वाले लोजपा को 29 सीटें मिली और हम को एक सीट के बदले छह सीटें और उपेंद्र कुशवाहा को इस आधार पर छह सीटें दे दी गई।”

‘धूर्त पावर ब्रोकर’ लोग जदयू का टिकट बांट रहे

जदयू ने अपने सभी 101 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिया है। कुल 4 सीटों पर मुसलमान उम्मीदवार हैं। 3 सीमांचल में और 1 चैनपुर में जमा खान को। पिछली बार 11 मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया गया था। ‌

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विवेकानंद सिंह कुशवाहा लिखते हैं कि, “नीतीश कुमार के लिए लड़ने वाले लोग जमीन पर धरना दे रहे हैं और धूर्त पावर ब्रोकर लोग जदयू का टिकट बांट रहे हैं। मीडिया के जरिये माहौल बना दिया गया कि नीतीश कुमार ने संजय को डांटा, ऐसा संदेश गया लोगों के बीच कि शेर बूढ़ा है तो क्या, शेर है। हम लोगों का भी थोड़ा दोष है इसमें, पर क्या किसी ने संजय को डांटते हुए नीतीश कुमार को देखा? खबर कहां से आयी मीडिया के पास? नीतीश कुमार का दिमाग सही से काम कर रहा होता तो उपेंद्र कुशवाहा उपेंद्र कुशवाहा को पंचायत के लिए दिल्ली जाना पड़ता?”

वह आगे कहते हैं, “अगर चुनाव से पूर्व नीतीश कुमार खुलकर मीडिया के सामने आकर अपनी बात नहीं रखते हैं, तो समझ लीजिए कि पावर ब्रोकर मीडिया के सहारे उनके बारे में उल्टी-सीधी कहानी खुद प्लांट कर रहा है, ताकि आपको लगे कि आपका नेता तो अभी भी इतना पावरफुल है कि सबको देख लेगा।”

नीतीश सूबे की सियासत में प्रासंगिक और दोनों गठबंधन की जरूरत 

22 अक्टूबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के द्वारा भाजपा प्रत्याशी रमा निषाद को माला पहनाई गई। जिसके बाद राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने एक्स हैंडल पर वीडियो शेयर कर सवाल उठाए “अगर नीतीश कुमार पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो फिर लिखी हुई पर्ची के जरिए भाषण क्यों पढ़ रहे हैं? और ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?”

इससे पहले भी कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों और बिहार विधानसभा के सत्र में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भाषण और प्रतिक्रियाओं को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा हुई थी।‌ इन वीडियोज़ को शेयर करते हुए विपक्ष ने कहना शुरू कर दिया कि नीतीश कुमार थक चुके हैं और वो भ्रमित दिखाई पड़ते हैं।‌ हलांकि राज्य सरकार और जदयू के साथ-साथ भाजपा का कहना है कि नीतीश कुमार बिल्कुल ठीक हैं और सरकार का नेतृत्व करने में सक्षम हैं। 

लेखक सत्येंद्र प्रताप इस घटना पर लिखते हैं कि,”बिहार में नीतीश कुमार महफ़िल लूट रहे हैं। मुझे लगता है कि भाजपा ने उन्हें पागल साबित करने की जितनी कोशिश की थी, अब एकदम ही मामला पलट दिया है नीतीश कुमार ने। महिला को माला पहनाकर महफ़िल लूट लिया। संघी को मंच पर ही डांट दिया। अब संघी मानसिकता के लोग उसे रील बनाकर नीतीश की बेइज्जती कर रहे  हैं और नीतीश का कोर वोट महिलाएं एक बार फिर नीतीश के फेवर में ध्रुवीकृत हो रही हैं।”

वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्रा लिखते हैं कि, “व्यवस्था से प्रताड़ित-शोषित और हताश युवाओं का बड़ा वर्ग पिछले चुनाव में तेजस्वी के साथ खड़ा था। इसके कारण राजग की सत्ता जाते जाते बची थी। हालांकि लव कुश, महादलित और आधी आबादी के समर्थन के कारण चिराग की साजिश के बावजूद नीतीश सूबे की सियासत में प्रासंगिक और दोनों गठबंधन की जरूरत बने रहे है।” 

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